Popular Posts

Wednesday, February 29, 2012

हरवलेला 'स्व'


------------------------------XXX---------XXX------------------------------

बालपणी हुंदडलेल्या रस्त्यांवरून
पुन्हा एकदा चालतांना
तेंव्हा खेळलेल्या काच्यांचा
पुन्हा आवाज ऐकताना
शिकलेल्या त्या शाळेकडे
पुन्हा जवळून पाहतांना

ती हाक कानी येते...
'कुठे आहेस तू..??'

घरानजिकच्या चौकामधल्या
जुन्या झाडाकडे बाघकातांना
तेंव्हा आम्हाला गोष्टी सांगणारे
ते आजोबा मला दिसतांना
त्यांनाच स्वत:ची ओळख
पुन्हा करून देतांना

ती हाक कानी येते...
'कुठे आहेस तू..??'

आजही वर्तमानाशी
झुंजत जगतांना
आजही भविष्यामधे
दूर कोठे बघतांना
आजही ती क्षितिजे
दूरच दूर दिसतांना

ती हाक कानी येते...
'कुठे आहेस तू..??'

खरच कुठे आहेस तू..??

वेड्यावाकड्या रस्त्यांच्या
ह्या जाळ्यात हरपलास?
की जीवनाच्या या जटील
चक्रव्यूहात अडकलास?
रुष्ठ या नशीबाच्या
आचेखाली करपलास?

की मेहेनत करतांना गाळलेल्या
घामासोबत झीरपलास?

अस्याच कित्येक प्रश्नांचा
उगाच गोंधळ होतांना
सततच्या ह्या गोंधळात
कान बधिर होऊ बघतांना

पुन्हा ती हाक कानी येते...
'कुठे आहेस तू..??'


------------------------------XXX---------XXX------------------------------

Back To: CONTENTS

Sunday, February 12, 2012

हो मी येतोय...

This poem was written when I was on the way to home from college hostel... to tell my mother that I am comming... :)

------------------------------XXX---------XXX------------------------------

शब्दांची ही माळ
मोठ्या उल्हासाने गुंफतोय
याच कारणास्तव तिला
अर्त भावनांनी सजवतोय

सांगायचेय आईला
की मी येतोय

भावनांच्या तुलनी
शब्द जणू पांगळे
व्याकुळता न व्यतिती
जरी कसेही रचीले

परी कळेल त्या आईला भाव
तिच्या पाडसाच्या मनितले

हो मी येतोय
तुझ्या चरण स्पर्शासाठि
तुझ्या प्रेमळ हातांना
माझ्या गाली लावण्यासाठी

कुशीत तुझ्या डोके ठेऊन
सर्व जगाला विसरण्यासाठी

सर्वांना सांगून ठेव
चांगले पदार्थ बनवून ठेव
नि या वेड्याला सहण्यासाठी
थोडी सवड काढून ठेव

कारण खरच मी येतोय
तिथल्या मातीच्या सुगंधासाठी
अंधुकलेल्या माझ्या पाउलखुन्नाना
पुन्हा एकदा उजळवण्यासाठी

नि मी येतोय तो पुन्हा तुझा
अवान्छित निरोप घेण्यासाठी


------------------------------XXX---------XXX------------------------------

Back To: CONTENTS

बहोत खूबसूरत हो क्यों




------------------------------XXX---------XXX------------------------------

बहोत खूबसूरत हो क्यों
तुम बहोत खूबसूरत हो क्यों

अगर मैं जो केहेदु शिकायत है तुमसे
तो मुझको खुदारा ग़लत मत समज़ना
के मेरी ज़रूरत हो क्यों
बहोत खूबसूरत हो क्यों

मैं देखु जो तुज़को दुरसे जब भी छुपकर
रहे जाता हूँ तेरी अदाओं मे खोकर
नज़दीकियों से जब के डरता बहोत हूँ
नज़रो से तेरी छुपता बहोत हूँ
भूलसे भी जो नज़रे मिलाती हो हमसे
या कोई इशारा सा करती हो हमसे
धड़कने तेज होती है क्यों

बहोत खूबसूरत हो क्यों

कभी दूसरो की उमिंदो का दड़पन
कभी उँचे सपनो से मिलता ख़ालीपन
जिंदगी की रविश मे मशरूफ हूँ जब
इसी सोच मे बेरुख हूँ तब
सामने तुम कुछ आती हो ऐसे
सारी बातें ना जाने भूल जाता हूँ कैसे
ऐसी आफ़तसी लाती हो क्यों

बहोत खूबसूरत हो क्यों

चाहत मे तेरी सोचु नज़म मैं लिखदु
तेरे नूर को क़ैद कर के मैं रखदु
पढ़ लो कभी जो इससे जल जाओ
खुदसे भी ज्यादा हँसी इसको पाओ
पर लिखना जो चाहूं वो लिखही ना पाउ
सोचु जो तुज़को, सोचता ही रहे जाउ
ऐसी बेदर्द बनती हो क्यों

बहोत खूबसूरत हो क्यों

अगर मैं जो केहेदु शिकायत है तुमसे
तो मुझको खुदारा ग़लत मत समज़ना
के मेरी ज़रूरत हो क्यों
बहोत खूबसूरत हो क्यों
तुम बहोत खूबसूरत हो क्यों


------------------------------XXX---------XXX------------------------------

Back To: CONTENTS