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Sunday, July 31, 2011

ऐ जमाने वालो



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ना वो आँधी ना ये तुफ़ा
ना वो ज्वार ना ही ये सूखा
हमे कभी रुला सके
अब तुम भी ना ऐसी कोशिश करना
ऐ जमाने वालो
क्यों की जब भी हम रोते है
कुछ तो बदल ज़रूर देते है

ना ये जख्म ना वो घाव
नाही वो मन मे उठता तनाव
हमे कभी तड़पा सके
अब तुम भी ना हमे तड़पाना
ऐ जमाने वालो
क्यों की जब भी हम तड़पते है
कुछ तो बदल ज़रूर देते है

कभी शांति तो कभी विनाश
कभी गाँधी तो कभी सुभाष
हम किसकी राह चुनेंगे
ये परखने की भूल ना करना
क्यों की जब भी, जैसे भी हम लढते है
कुछ तो बदल ज़रूर देते है

ना वो फलक ना ये धरा
और नाही ये सागर सारा
तुम्हे भागने के लिए काफ़ी होगा
अब हमे ना सरफ़रोश बना देना
क्यों की जब भी हम सरफ़रोश बनते है
तो बहोत कुछ बदल ज़रूर देते है


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Wednesday, July 20, 2011

एहेसास एक बूँद सा



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तुम्हारा ये एहेसास
जैसे बारिश की एक बूँद
बादलों से छुटकर
ज़मीं को चिढाती
हरे पत्ते पर

लटकती हुई

देखकर इसे
हवा भी थम जाए
छूकर जिसे
किरणों को पहचान मिल जाए
ऐसी ही एक बूँद
हरे पत्ते पर
लटकती हुई

  ये
तुम्हारा एहेसास
एक बूँद ही तो है
यादों से निकलकर
मुझे चिढ़ाती
मेरे दिल के पत्ते पर
लटकती हुई

देखकर जिसे
समय भी थम जाए
पाकर जिसे
मुझे पहचान मिल जाए
ऐसी ही एक बूँद
मेरे दिल के पत्ते पर
लटकती हुई

सोचता हूँ कभी
दूर कही चला जाउ
तुम्हारे एहेसासों की दुनिया में
चारों और जहाँ
बूंदे ही बूंदे हो बारिश की
हरे पत्तों पर
लटकती हुई
...

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Thursday, July 14, 2011

मैं भारत का नवयुवक (composed on: 10th Aug 2010)

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मैं भारत का नवयुवक
रोज सबेरे उठता हूँ
सारे सपने घरपर छोड़
कामकाज को निकलता हूँ

रोजवाली उसी राह के
उसी खड्डे से गुज़रता हूँ
भीड़भाड़ से ऑफीस पोहोच
दिनभर महेनत करता हूँ

शाम को घरपर छोड़ने वाली
उसी बस में चढ़ता हूँ
फिरसे उसी खड्डे से होकर
अपने घर पोहोचता हूँ

मैं भारत का नवयुवक
कभी धमाके सुनता हूँ
दो आँसू बहता हूँ
जब इनमें अपनो को खोता हूँ

मेरा देश चलाने वालों के
भ्रष्टाचार को सहेता हूँ
विधान भवन में चलाने वाली
चप्पले भी देखता हूँ

इन सबसे होने वाले
दर्द से पीड़ित होता हूँ
इसी पीड़ा को मन मे लिए
किसी रात को सोता हूँ

मैं भारत का नवयुवक
अगली सुबह उठता हूँ
सारी पीड़ा घरपर छोड़
कामकाज को निकलता हूँ

रोजवाली उसी राह के
उसी खड्डे से गुज़रता हूँ
भीड़भाड़ से ऑफीस पोहोच
दिनभर
महेनत करता हूँ

शाम को घरपर आते आते
फिरसे सबकुछ भूलता हूँ
इसी रात को सोने पर
नये सपने देखता हूँ

मैं भारत का नवयुवक
अब एक सबेरे जगूंगा
जातीधर्म की भिन्नताओं मे
मैं खुदको ना बाटुंगा

मैं 'भारतीय' यही एक
अपनी पहेचान बताउंगा
पीड़ाजनक हर घटना के खिलाफ
अब 'एक आवाज़' उठाउंगा

मैं राष्ट्र का नवयुवक
अब एक सबेरे जगूँगा ...


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Wednesday, July 13, 2011

महेज एक ख़याल (Composed on: 24th Jan 2010)

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तुम कभी दिल मे मेरे
एक ख़याल बनकर आती हो
मुझे खुदसे ही बहोत
दूर कही ले जाती हो

अंजान खुदसे मैं
तुम्हे देखता रहे जाता हूँ
और आँखो मे मुझे बसा
तुम पलके झुका लेती हो

इन ख़यालो से निकल जब
मुझे अपना एहेसास होता है
पाकर दूर तुम्हे ख़ुदसे
बड़ा बेचैनसा लगता है

इसी तनहाई मे किसी को देख
यू लगता है के तुम हो
इसी तनहाई मे किसी की आहट सुन
यू लगता है के तुम हो

फिर छुपकर कही दुरसे
उसे देखता रहेता हूँ
उसे देखने वाली हर नज़र से
खूब जला करता हूँ

इतना हसी पाकर उसे
ख़ुदसे ही डरने लगता हूँ
क्या भाऊंगा मैं उसको भी
यही सोचकर रहेता हूँ

अब मेरी यहा हालत देख
तुम बहोत हसने लगती हो
फिर से कभी दिल मे मेरे
जब ख़याल बनकर आती हो

फिर मेरा हात थामकर
दूर कही ले जाती हो
तुम कभी दिल मे मेरे
एक ख़याल बनकर आती हो ...

तुम कभी दिल मे मेरे
एक ख़याल बनकर आती हो ...

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Wednesday, July 6, 2011

गत-क्षणांच्या सभेत (Composed on: 5th March 2005)

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माझ्या मनमंचावर बरेचदा
गत-क्षणांच्या सभा होतात
प्रत्येक वेळी ते मात्र
माझ्या विषयीच बोलत असतात

अश्याच एका क्षणांच्या सभेत
मीही चोरून उपस्थित होतो
स्वतःपुरत माझ्याविषयी बोलणार्‍या
प्रत्येक क्षणाला ऐकत होतो

प्रत्येक क्षण आपआपला 'मी'
निकषाने मांडायचा
तो किती योग्य नि बरोबर
हे सर्वांना सांगायचा

प्रत्येक क्षण बोलून झाला
की मी स्वतःवरच हसायचो
ह्यांच्याच साठी का जगतोय आपण
अस स्वतःलाच विचारायचो

असा त्या क्षणांवर हसणारा 'मी'
मी कधी ओळखलाच नाही
उपस्थित असलेला मी तिथे
त्या क्षणांनाही दिसलाच नाही

जगतोय मी ज्यासाठी तो
क्षण तर तेथे भेटलाच नाही
आजवर जगलेल्या आयुष्याला मग
अर्थ तरी उरला काही

परी येणार्‍या प्रत्येक क्षणामधून
तो श्रेष्ठ क्षण घडवायचा आहे
नि मनमंचावरील गत-क्षणांच्या सभेत
एकदा पुन्हा उपस्थित राहायच आहे


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Reading Between the Lines: 

It is in the lonely times when all the past memories (moments) come to his mind and starts boasting about themselves explaining why they were important in his life. At the end when every moment is done boasting he thinks, "are these the moments that I am living for?" And realizes that the moment for which he wants to live is yet to happen to him. That is when he decides to make every future moment so special that, by living in which he should feel like he has lived the entire life in real sense...!!

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Saturday, July 2, 2011

जिंदगी की कशमकश में

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जिंदगी की कशमकश में 
उलझकर इतना रहे गए
तुमने दिलपर दी दस्तक मगर
हम दिल लगाना भुल गए

कभी गहरे ख्वाबो में
तो कभी ऊँचे इरादों में
कभी ठगती परछाइयों में
तो कभी थकाती जिम्मेदारियों में
हम व्यस्त इतना रहे गए
मिलना था कभी तुमसे मगर
हम फुरसत निकालना भुल गए

कभी उन शर्मोहयाओने
तो कभी सिसकती आहों ने
कभी अनजान फासलों ने
तो कभी कमजोर इरादों ने
हमें इस कदर बांधे रखा
तुमने मिलाई जो नजर हमसे
तेरी आँखों में देखना भुल गए

अब हमें ना कोई हैरत होगी
गर हमसे तुम्हे शिकायत है
हमें ना कोई गैरत होगी
गर तुमसे ना मोहब्बत करने की इजाजत है
हम तो जुर्म ही ऐसा कर बैठे
तुमने तो की हर कोशिश मगर
तुम्हे समझना हम भुल गए

जिंदगी की कशमकाश में
उलझकर इतना रहे गए
तुमने दिलपर दी दस्तक मगर
हम दिल लगाना भुल गए

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