तुम्हारा ये एहेसास
जैसे बारिश की एक बूँद
बादलों से छुटकर
ज़मीं को चिढाती
हरे पत्ते पर
लटकती हुई
देखकर इसे
हवा भी थम जाए
छूकर जिसे
किरणों को पहचान मिल जाए
ऐसी ही एक बूँद
हरे पत्ते पर
लटकती हुई
ये तुम्हारा एहेसास
एक बूँद ही तो है
यादों से निकलकर
मुझे चिढ़ाती
मेरे दिल के पत्ते पर
लटकती हुई
देखकर जिसे
समय भी थम जाए
पाकर जिसे
मुझे पहचान मिल जाए
ऐसी ही एक बूँद
मेरे दिल के पत्ते पर
लटकती हुई
सोचता हूँ कभी
दूर कही चला जाउ
तुम्हारे एहेसासों की दुनिया में
चारों और जहाँ
बूंदे ही बूंदे हो बारिश की
हरे पत्तों पर
लटकती हुई ...
जैसे बारिश की एक बूँद
बादलों से छुटकर
ज़मीं को चिढाती
हरे पत्ते पर
लटकती हुई
देखकर इसे
हवा भी थम जाए
छूकर जिसे
किरणों को पहचान मिल जाए
ऐसी ही एक बूँद
हरे पत्ते पर
लटकती हुई
ये तुम्हारा एहेसास
एक बूँद ही तो है
यादों से निकलकर
मुझे चिढ़ाती
मेरे दिल के पत्ते पर
लटकती हुई
देखकर जिसे
समय भी थम जाए
पाकर जिसे
मुझे पहचान मिल जाए
ऐसी ही एक बूँद
मेरे दिल के पत्ते पर
लटकती हुई
सोचता हूँ कभी
दूर कही चला जाउ
तुम्हारे एहेसासों की दुनिया में
चारों और जहाँ
बूंदे ही बूंदे हो बारिश की
हरे पत्तों पर
लटकती हुई ...

Itna bhi door mat jaao
ReplyDeleteki wapis na aao
barish ki bboond agar uski yaad dilati hai...
garmi mi bhi kuch kum nahi yadoon ko sukha deti hai..
He he he ...
ReplyDeleteThanks Teeeejjjjjuuuuuuuu ... :)
Yadon ko sukhaane wali poem GARMI me likhunga .. till then keep watching this space ... ;)
In this entire poem, I understood only one word - whose Occurrence is four times.
ReplyDelete:) yes, that word was specially for you dear ... ;)
ReplyDeleteunka ehsaas na barsti boond sa tha
ReplyDeletejo mere anshuo me khi shamil ho gya
unka ensaas na sukoon sa tha
jo pal me aaya pal me kahi kho gya
unka ehsaas ek meetha dard tha
babasta sehan krna muskil ho gya
unka ehsaas ek marj tha 'ajab'
dekhte dekhte kambkht la-illaz ho gya