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Thursday, July 14, 2011

मैं भारत का नवयुवक (composed on: 10th Aug 2010)

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मैं भारत का नवयुवक
रोज सबेरे उठता हूँ
सारे सपने घरपर छोड़
कामकाज को निकलता हूँ

रोजवाली उसी राह के
उसी खड्डे से गुज़रता हूँ
भीड़भाड़ से ऑफीस पोहोच
दिनभर महेनत करता हूँ

शाम को घरपर छोड़ने वाली
उसी बस में चढ़ता हूँ
फिरसे उसी खड्डे से होकर
अपने घर पोहोचता हूँ

मैं भारत का नवयुवक
कभी धमाके सुनता हूँ
दो आँसू बहता हूँ
जब इनमें अपनो को खोता हूँ

मेरा देश चलाने वालों के
भ्रष्टाचार को सहेता हूँ
विधान भवन में चलाने वाली
चप्पले भी देखता हूँ

इन सबसे होने वाले
दर्द से पीड़ित होता हूँ
इसी पीड़ा को मन मे लिए
किसी रात को सोता हूँ

मैं भारत का नवयुवक
अगली सुबह उठता हूँ
सारी पीड़ा घरपर छोड़
कामकाज को निकलता हूँ

रोजवाली उसी राह के
उसी खड्डे से गुज़रता हूँ
भीड़भाड़ से ऑफीस पोहोच
दिनभर
महेनत करता हूँ

शाम को घरपर आते आते
फिरसे सबकुछ भूलता हूँ
इसी रात को सोने पर
नये सपने देखता हूँ

मैं भारत का नवयुवक
अब एक सबेरे जगूंगा
जातीधर्म की भिन्नताओं मे
मैं खुदको ना बाटुंगा

मैं 'भारतीय' यही एक
अपनी पहेचान बताउंगा
पीड़ाजनक हर घटना के खिलाफ
अब 'एक आवाज़' उठाउंगा

मैं राष्ट्र का नवयुवक
अब एक सबेरे जगूँगा ...


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3 comments:

  1. Let’s take positive inspiration out of it …
    This poem doesn’t talk about all the great things our The Great Nation has, because those no more need Youths attention .. !!

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